प्यारी दुलारी

हरी भरी छरहरी

सरसरी सनसनी सुनहरी 

जो मुसमूसी रुई सी

कमरे में धूप सी

घुसी फिर निकल गई

इक पकड़ 

जो छूट गई 

फूट फूट झरने सी जो लोटती थी 

अब लुट गई 

सुप्त गुप्त लुप्त हुई 

मिट गई 

सूँई की आँख में

रेशम के तार सी 

वो पिर गई

वो मेरी तेरी 

प्यारी सी

दुलारी सी

भर्राई सी वो भर गई 

झुक गई 

वो डाल सी 

फूल की फुहार सी 

पंखुड़ी वो

 खिल के फिर बिखर गई 

धूल सी उड़ गई 

वो धुंधली एक याद सी 

गीली नमी वो बूँद सी 

टपक गई 

वो मिल गई 

वो घुल गई 

चाकू की धार थी

वो सब्ज़ियों सी 

कट गई

बूढ़ी आँख की वह रोशनी

ज़र्रा ज़र्रा

बिखर गई

यही कही 

भिंची भिंची

वो पिस गई 

धान के निधान सी 

वो खप गई 

बरस गई 

धीमी धीमी 

धार सी 

रिस गई 

वो घिस गई

रस्सी या 

तार सी 

वो खिच गई 

मेरी तेरी 

प्यारी सी

दुलारी सी

मलाई सी फिसल गई 

दूध सी सफ़ेद थी 

वो खोट से यूँ भर गई 

बह गई 

डूबने से मगर 

वो बच गई 

अब फैल के वह सो रही 

छरहरी भरभरी 

भर्राई सी 

तर्जनी सी हाथ की 

वो कील सी गड़ गई 

अब उसे इधर उधर की फ़िक्र नहीं 

सुधर गई 

बिगड़ गई

वो ज़िक्र से

मलाल से

गुलाल सी 

वो लाल सी

अब रच गई 

मख़मली रूमाल सी 

वो हर जगह जो बिछ गई 

फूल से अस्तित्व की 

ख़ुशबू वह बहार की 

अब हर जगह 

फैलती

वो इश्क़ की शर्म सी

लालिमा वो गाल पे 

कभी जो दिख गई 

या छुप गई

तेरी 

मेरी 

प्यारी सी

दुलारी सी

वो घूमती 

घुमक्कड़ धरा सी 

सिंची-सिंची ज़मीन सी 

यूँ अब उपज गई 

गुलाब के वो

फूल सी

वो फूलों सी थी

जो फूल सी ही चढ़ गई ।।

Published by